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क्या ‌BJP 'वन नेशन वन इलेक्शन' के जरिए वोटिंग पैटर्न को अपने फायदे के लिए भुनाना चाहती है?

THN Network



NEW DELHI: 'अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते हैं, तो 77% वोटर्स दोनों जगह एक ही पार्टी को वोट करते हैं। अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में 6 महीने का अंतर होता है, तो एक ही पार्टी को वोट देने की संभावना 77% से घटकर 61% रह जाती है। दोनों चुनाव में 6 महीने से ज्यादा अंतर होने पर एक ही पार्टी को वोट करने की संभावना 61% से भी कम हो जाती है।'

पब्लिक-पॉलिसी से जुड़े मुद्दों के थिंक टैंक IDFC इंस्टीट्यूट की एक स्टडी में सामने ये रोचक तथ्य सामने आया। तो क्या ‌BJP 'वन नेशन वन इलेक्शन' के जरिए इसी वोटिंग पैटर्न को अपने फायदे के लिए भुनाना चाहती है? राजनीतिक जानकारों का कहना है कि केंद्र के लिए PM मोदी का चेहरा सबसे मजबूत है। अगर लोकसभा के साथ विधानसभा के चुनाव भी होते हैं तो इसका फायदा BJP को मिल सकता है। खासकर UP, MP, राजस्थान जैसे काऊ बेल्ट वाले राज्यों में।

इस एनालिसिस में 2004, 2009, 2014 और 2019 में एकसाथ हुए लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को शामिल किया गया है...

2004: लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वोटिंग का पैटर्न

2004 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को जीत हासिल हुई थी। इसके साथ ओडिशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और सिक्किम के विधानसभा चुनाव भी हुए थे। 
2004 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को जीत हासिल हुई थी। इसके साथ ओडिशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और सिक्किम के विधानसभा चुनाव भी हुए थे। तस्वीर में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं।
ओडिशा: मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने चुनाव होने से लगभग एक साल पहले विधानसभा भंग कर दी थी। इसके बाद मौजूदा चुनाव में बीजू जनता दल ने 147 विधानसभा सीटों में से 61 सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी ने 32 सीटें जीतीं। साथ ही हुए लोकसभा चुनाव में बीजू जनता दल ने राज्य की 21 सीटों में से 11 सीटें जीतीं, जबकि उसके सहयोगी को 7 सीटें मिलीं थीं।

कर्नाटक: विधानसभा चुनाव में BJP 224 में से 79 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। कांग्रेस को 65 सीटें और जनता दल (सेक्युलर) को 58 सीटें मिलीं और उन्होंने गठबंधन सरकार बनाई। इसी समय हुए लोकसभा चुनाव में भी यही पैटर्न देखने को मिला। भाजपा ने 28 में से 18 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 8 और जनता दल (सेक्युलर) को 2 सीटें मिलीं।

आंध्र प्रदेश: वाईएस राजशेखर रेड्डी की लोकप्रियता ने कांग्रेस को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जीत दिलाने में मदद की। 294 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस पार्टी को 185 सीटें मिलीं। तेलुगु देशम पार्टी जो एक दशक से राज्य की सत्ता में थी, उसे सिर्फ 47 सीटें मिलीं। इसी तरह लोकसभा में कांग्रेस ने 42 संसदीय सीटों में से 29 सीटें जीतीं, जबकि उसकी प्रतिद्वंद्वी तेलुगु देशम पार्टी को सिर्फ 5 सीटें मिलीं।

सिक्किम: सिक्किम में पवन कुमार चामलिंग के नेतृत्व में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार दोबारा सत्ता में आई। सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 71.1% वोट के साथ 32 विधानसभा सीटों में से 31 सीटें हासिल करके आसानी से सत्ता बरकरार रखी। इसके साथ ही पार्टी ने राज्य की एकमात्र संसदीय सीट भी जीत ली।

2009: लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वोटिंग का पैटर्न

2009 लोकसभा चुनाव के दौरान अमृतसर की एक रैली में तत्कालीन PM मनमोहन सिंह और कांग्रेस नेता राहुल गांधी। इस चुनाव में भी कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई थी।
2009 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 543 सीटों में से 206 सीटें जीती। कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA को 262 सीटें मिलीं। इस गठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल शामिल थे। 2009 में लोकसभा चुनाव के करीब ही आंध्र प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम में विधानसभा चुनाव हुए। इस बार भी ये देखने को मिला कि लोगों ने राज्य में जिस पार्टी को वोट किया है, उसी पार्टी के उम्मीदवार को केंद्र के लिए भी वोट किया है...

आंध्र प्रदेश: वाईएस राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने लोकसभा की 42 लोकसभा सीटों में से 33 पर जीत हासिल की। इसी पैटर्न पर 294 विधानसभा सीटों में से 156 सीटें भी कांग्रेस ने जीती।

ओडिशा: नवीन पटनायक की BJD को ओडिशा में 21 में से 14 लोकसभा सीटों पर जीत मिली। इसी पैटर्न पर 147 विधानसभा सीटों में से 103 सीटों पर जीत मिली। इस चुनाव में नवीन पटनायक BJP से गठबंधन तोड़कर अकेले दम पर चुनाव लड़े थे। इस चुनाव में कांग्रेस को केवल छह लोकसभा सीटें मिलीं थीं।

सिक्किम: चामलिंग लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बने। सत्ताधारी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने राज्य की 32 की 32 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं, राज्य की एकमात्र संसदीय सीट पर भी पवन कुमार चामलिंग पार्टी को जीत मिली।

2014: जिस पार्टी को लोकसभा में वोट, विधानसभा में भी उसी को वोट

तीन दशक में पहली बार लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। BJP को 282 सीटें और कांग्रेस महज 44 सीटों पर समिट गई। 2014 में लोकसभा के साथ ही चार राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए...

आंध्र प्रदेश: विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल तेलुगु देशम पार्टी 175 विधानसभा सीटों में से 103 सीटें जीत गई। वहीं YSR कांग्रेस को कुल 62 सीटें हासिल हुईं। तेलुगु देशम पार्टी 25 लोकसभा सीटों में से 16 सीटें जीती वहीं कांग्रेस 2 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा में कांग्रेस को 2.8% और विधानसभा में 2.9% वोट मिले।

ओडिशा: ओडिशा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और 2009 की तरह ही परिणाम उनके पक्ष में रहा। लोकसभा में BJP को 21 में से 20 सीटें मिलीं। विधानसभा चुनाव में BJP को 147 में से 117 सीटें मिलीं। यहां भी कांग्रेस 16 सीटों के साथ काफी पीछे रह गई।

अरुणाचल प्रदेश: कांग्रेस को विधानसभा की 60 सीटों में से 42 सीटें हासिल हुईं। 2014 में अरुणाचल की दो लोकसभा सीटों में से एक कांग्रेस और एक भाजपा के खाते में गई।

सिक्किम: पवन चामलिंग की सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 32 विधानसभा सीटों में से 22 सीटें जीतीं। इसके साथ ही इकलौती लोकसभा सीट भी दोबारा हासिल कर ली।

2019: जिस पार्टी को लोकसभा में वोट, विधानसभा में भी उसी को वोट

आंध्र प्रदेशः YSR कांग्रेस ने 175 में से 151 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। दूसरे नंबर पर तेलगू देशम पार्टी ने 23 सीटें जीतीं और यहां कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल सका। लोकसभा चुनाव में भी YSR कांग्रेस ने कुल 25 में से 22 सीटें जीत लीं।

ओडिशा: विधानसभा चुनाव में BJD ने 146 में से 112 सीटें जीती। भाजपा को 23 और कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं। लोकसभा की 21 सीटों में BJD ने 12 और BJP ने 8 सीटें जीतीं। कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी।

सिक्किमः विधानसभा चुनाव में कुल 32 सीटों में सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा को 17 और सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट को 15 सीटें मिलीं। वहीं लोकसभा की एकमात्र सीट भी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट को मिली।

अरुणाचल प्रदेशः विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 60 में 41 सीटें जीत लीं। कांग्रेस सिर्फ चार सीटें ही जीत सकी, जबकि पहली बार यहां चुनाव में उतरी जनता दल यूनाइटेड ने भी सात सीटें जीतीं। एक और नई पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) को भी पांच सीटें मिलीं। लोकसभा की दोनों सीटों पर भाजपा ने जगह बनाई।

अगर विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ नहीं होते, क्या पैटर्न दिखता है?

IDFC इंस्टीट्यूट की स्टडी में इस सिनेरियो को समझने के लिए कर्नाटक का उदाहरण सबसे सटीक है। कर्नाटक में 1999 और 2004 के विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ हुए थे। जबकि 2009 और 2014 के चुनाव 6 महीने से ज्यादा के गैप में हुए।

1999 के चुनाव में 74% निर्वाचन क्षेत्रों में एक ही पार्टी के उम्मीदवार जीते। 2004 में 79% निर्वाचन क्षेत्रों में एक ही पार्टी के उम्मीदवार जीते, लेकिन 2009 में एक ही पार्टी के उम्मीदवार जीतने का प्रतिशत घटकर 57% रह गया। 2014 में ये और घटकर महज 39% रह गया।

क्या इस वोटिंग पैटर्न और वन नेशन वन इलेक्शन का बीजेपी को फायदा मिलेगा?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि एक साथ चुनाव होने से क्षेत्रीय दलों के मुकाबले BJP जैसी राष्ट्रीय प्रभुत्व वाली पार्टी को फायदा मिल सकता है। इसकी 3 बड़ी वजहें हैं...

लोकसभा चुनाव के वक्त वोटर आमतौर पर राष्ट्रीय मुद्दों पर वोट करता है। IDFC स्टडी से साफ है कि 77% संभावना है कि वो एक ही पार्टी को वोट करे। ऐसे में BJP को फायदा मिलना लाजिमी है।
केंद्र सरकार के पास ज्यादा संसाधन होते हैं। आकर्षक योजनाएं और घोषणाएं करके चुनाव के वक्त वो एक माहौल बना सकती है। इस तरह वो क्षेत्रीय पार्टियों पर एक बढ़ हासिल कर सकती है।

लोकसभा चुनाव के लिए 26 से ज्यादा विपक्षी पार्टियां INDIA गठबंधन बना रही हैं। अगर राज्यों के चुनाव भी एक साथ होंगे तो वहां गठबंधन पर मामला उलझ जाएगा। उदाहरण के लिए अरविंद केजरीवाल दिल्ली में किसी और पार्टी के साथ अपनी शक्ति का बंटवारा क्यों करेंगे या ममता पश्चिम बंगाल में ये क्यों करेंगी। विपक्षी एकता में इस फूट पड़ने का फायदा BJP को मिल सकता है।

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