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नीतीश कुमार को बीजेपी से जुदा करने की कोशिश क्यों कर रहा INDIA अलायंस?


THN Network

PATNA DESK: हाल के दिनों में कुछ राजनीतिक घटनाक्रम पर ध्यान दीजिये तो चार बातें बेहद कंफ्यूज कर रही हैं. पहला अखिलेश यादव ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नाम लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से केंद्री की एनडीए सरकार से समर्थन वापसी लेने का आग्रह किया. वहीं, इससे पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने राज्य में आरक्षण में आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने के लिए जाति जनगणना कराने की बात कही है. उन्होंने यह भी कहा है कि राज्य में कास्ट सेंसस के बाद ही लोकल बॉडी के इलेक्शन कराए जाएंगे. वहीं, इन दोनों घटनाक्रम से पहले देखें तो नीतीश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग की आवाज बिहार के कुछ नेताओं ने उठाई है. सबसे दिलचस्प यह कि नीतीश कुमार के विरोध में स्वर बुलंद करते रहे चिराग पासवान ने नीतीश कुमार को भारत रत्न दिए जाने की मांग का समर्थन किया है. इन चारों घटनाक्रम पर नजर डालेंगे तो आपको केंद्र की वर्तमान राजनीति और नीतीश कुमार के हाथ में सत्ता की चाबी का गुणा-गणित समझ में आने लगेगा.

दरअसल, केंद्र में  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की सरकार पूर्ण बहुमत से चल तो रही है, लेकिन सत्ता की चाबी दो प्रमुख दलों-टीडीपी और जेडीयू के हाथों में है. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के पास लोकसभा की 12 सीटें हैं, वहीं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के पास 16 सीटें हैं. भाजपा 240 सीटों के दम पर सबसे बड़ी पार्टी जरूर है, लेकिन बहुमत के 272 के आंकड़ों से बहुत दूर (32 सीट) है. जाहिर है बिना इन दोनों कंधों (जेडीयू-टीडीपी की 28 सीटों) के सरकार चला पाना मुश्किल है. हालांकि, कई छोटी सहयोगी पार्टियां भी हैं जो एनडीए सरकार में सत्ता की साझेदारी हैं. इनमें शिवसेना शिंदे गुट की 7 सीटें, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की 5 सीटें, जनता दल सेक्युलर 2 सीट, अपना दल (अनुप्रिया पटेल) 2 सीट, एनसीपी (अजीत गुट) 1 एनपीजीपी, आजसू एनटीपीसी, एमएफ, एसकेएफ की एक एक सीटें मिलाकर 293 का आंकड़ा पहुंचता है. यानी बहुमत से 21 सीटें अधिक.

इंडिया अलायंस का समीकरण भी समझ लीजिये
वहीं, विपक्ष में कांग्रेस की 99, समाजवादी पार्टी की 37, टीएमसी की 29, डीएमके की 22, शिवसेना (उद्धव गुट) की 9, एनसीपी (शरद पवार गुट) की 7, राजद की 4 सीटों के साथ अन्य छोटी दलों का सपोर्ट भी है और इनको मिलाकर कुल 231 की संख्या हो जाती है. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर छोटे दलों में जो बड़े दल हैं, जैसे टीडीपी और जेडीयू…इनके साथ आये बगैर केंद्र में विपक्षी गठबंधन की सत्ता की ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकती है. ऐसे में अखिलेश ने जेपी के नाम को आगे कर नीतीश कुमार के लिए ‘सियासी दाना’ डाला है और मोहरा बनाने की कोशिश की है. वहीं, रेवंत रेड्डी ने जातिगत गणना की चाल चलकर नीतीश कुमार को इंडिया अलायंस की ओर झुकाने की कवायद की है, क्योंकि नीतीश कुमार भी जातीय जनगणना के समर्थन में हैं. खास बात कि अब तक इसको लेकर केंद्र सरकार की ओर से कोई स्पष्टता भी नहीं है कि वह इसके पक्ष में है भी या नहीं. ऐसे में नीतीश कुमार को एनडीए से जुदा करने की चाल के तौर पर देखा जा रहा है.

वक्त-वक्त की बात है कब कौन किसके साथ है?
ऐसे भी कहते हैं ना कि राजनीति में ना तो कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही दुश्मन, सारा कुछ वक्त की परिस्थितियों पर निर्भर करता है और सत्ता के समीकरण इसी से साधे जाते हैं. कब कौन किस पाले में चला जाए और कौन सा सत्ता समीकरण धराशायी हो जाए और कौन सत्ता के शीर्ष पर पहुंच जाए, यह वक्त के सिवा सिर्फ वह नेता ही जानते हैं जो इस खेल में रहते हैं. जम्मू कश्मीर में बीजेपी की विपरीत विचारधारा वाली महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के साथ वर्ष 2014 में जब भाजपा ने सरकार बनाई थी तब भी ऐसा ही कहा गया था और इस समीकरण को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की आड़ में जायज ठहराया गया था. जब लालू प्रसाद यादव के धुर विरोधी कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने 2015 में साथ आकर बिहार में बड़ी जीत हासिल की और सरकार बनाई तो बीजेपी विरोध के नाम पर इसे नैतिक ठहराया गया था. वहीं, भारतीय जनता पार्टी से विरोधी विचारधारा की बात कहते हुए भी नीतीश कुमार बीते 19 वर्षों से सत्ता में साझेदार हैं तब भी इसको जायज ठहराया जाता है.



टीडीपी ने 2018 में दिखाए थे तेवर पर फिर आए साथ
इसी तरह तेलगुदेशम पार्टी ने मोदी सरकार का विरोध करते हुए 2019 लोकसभा चुनाव से पहले वर्ष 2018 में एनडीए का साथ छोड़ दिया था और अब फिर से सत्ता में साझीदार हैं. इससे पहले नीतीश कुमार कभी पीएम मोदी के धुर विरोधी तो कभी दोस्त हो जाते हैं. वक्त के साथ बदलता मन भी कई सवालों को जन्म देता रहा है. बता दें कि 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने बिहार में मोदी को प्रचार करने के लिए आने नहीं दिया था. इसके बाद 2010 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी नीतीश ने मोदी को बिहार में प्रचार करने नहीं दिया था. जून 2010 में पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले पटना के अखबारों में विज्ञापन छपे, जिसमें नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार के साथ हाथ मिलाते हुए दिखाया गया था. इससे नीतीश इतने नाराज हुए कि उन्होंने बीजेपी नेताओं के लिए डिनर तक कैंसिल कर दिया था. नीतीश कुमार ने तो कोसी बाढ़ राहत के लिए गुजरात सरकार से मिला पांच करोड़ रुपये का चेक भी लौटा दिया था.

नीतीश कुमार की पलटबाजी बाजियां भी पलट देती हैं!
इसके बाद जब भाजपा ने सितंबर 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो नीतीश कुमार इससे नाराज हो गए. इसके बाद जून 2013 में नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग हो गए. बीजेपी और जेडीयू 17 साल का साथ छूट गया था. 2014 का लोकसभा चुनाव नीतीश कुमार ने अकेले लड़ा लेकिन उनकी करारी हार हुई. 2014 में नीतीश ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद 2015 में विरोधी होते हुए भी लालू यादव के साथ हो लिये और विधानसभा चुनाव में जीत कर सरकार बना ली. नीतीश लालू की जोड़ी 2017 तक चली, पर नीतीश कुमार फिर एनडीए के साथ आ गए. एनडीए में आने के बाद 2019 तक लोकसभा और 2020 का चुनाव साथ लड़े. 2020 में बनी एनडीए की सरकार 2022 तक चली और नीतीश कुमार ने फिर तेजस्वी यादव के साथ सरकार बना ली. इसके बाद फिर 17 महीनों के बाद नीतीश कुमार एनडीए के साथ आ गए.

टीडीपी-जेडीयू पर इंडिया अलायंस की इसलिए है नजर
वहीं, नीतीश कुमार की तरह ही चंद्रबाबू नायडू और भाजपा के बीच उतार-चढ़ाव भरे रिश्ते रहे हैं. टीडीपी 2018 तक मोदी सरकार के साथ रही थी, लेकिन मार्च 2018 में मोदी सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया. 2019 में नायडू अलग लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन उनकी पार्टी की बुरी गत हो गई. बहरहाल, एक बार फिर अब वह एनडीए के साथ हैं और इस बार उनके पास सीटों की अच्छी खासी संख्या है. दरअसल, सरकार में बने रहने के लिए मोदी सरकार को 272 सीटें जरूरी हैं. बीजेपी की 240 के साथ टीडीपी की 16 और जदयू की 12 सीटें मिलकर 268 का आंकड़ा पहुंचता है. बाकी 24 सीटें दूसरी पार्टियों की हैं. अगर एक भी पार्टी साथ छोड़ती है तो एनडीए के पास बहुमत तो रहेगा, लेकिन सरकार कमजोर हो सकती है. अगर टीडीपी साथ छोड़ती है तो एनडीए के पास 276 सांसद बचेंगे. सरकार बहुमत में तो रहेगी लेकिन बहुमत से कुछ ही सीट अधिक बचेगी.

अगर ऐसा हो गया तो मोदी सरकार बहुमत खो देगी
वहीं, नीतीश जदयू की अलग होती है तो 280 सीटें बचेगी. ऐसी स्थिति में एनडीए के पास बहुमत तो रहेगा लेकिन सरकार कमजोर और विपक्ष मजबूत हो जाएगा. अगर दोनों पार्टियों साथ छोड़ देती हैं तो एनडीए सरकार बहुमत खो देगी. टीडीपी और जदयू के पास 28 सांसद हैं और दोनों के जाने का मतलब होगा कि एनडीए के पास 264 सीटें ही बचेंगी यानी बहुमत से चार सीटें कम. इस बीच नीतीश कुमार को भारत रत्न की मांग, अखिलेश यादव का जयप्रकाश नारायण का नाम लेकर नीतीश कुमार से मोदी सरकार से समर्थन वापसी का आग्रह करना और इसके पहले रेवंत रेड्डी का जातिगत गणना करने का ऐलान… केंद्र की राजनीति को भी टेस्ट करने के साथ ही ट्विस्ट भी कर सकता है. हालांकि, जदयू ने इसे खुले तौर पर इंकार कर दिया है कि उसका पाला बदलने का कोई मूड नहीं है, लेकिन कहते हैं न कि राजनीति है और राजनीति में तो कभी भी कुछ हो सकता है.

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