FOREIGN DESK: अमेरिका और मैक्सिको की सीमा पर एक शहर है, जिसका नाम नोगालेस है. यह शहर दो हिस्सों में बंटा हुआ है. एक हिस्सा अमेरिका के एरिज़ोना में है और दूसरा मैक्सिको के सोनोरा में. भले ही यह शहर भौगोलिक रूप से समान है और सांस्कृतिक रूप से भी कोई बड़ा अंतर नहीं है, लेकिन दोनों हिस्सों की आर्थिक स्थिति में भारी अंतर है. नोगालेस का जो हिस्सा अमेरिका में है, वहां के लोगों के पास ज्यादा पैसा है और वे अधिक समृद्ध हैं, जबकि मैक्सिको वाले हिस्से में रहने वाले लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं. आपको यह जानकार भी हैरानी होगी कि एक समय था, जब अमेरिका गरीब था, मगर मैक्सिको समृद्ध था. ऐसा क्या हुआ कि मामला अब पलट चुका है? इस अंतर का कारण है दोनों हिस्सों की संस्थागत संरचनाएं, जो राजनीतिक और आर्थिक रूप से अलग हैं. यह उदाहरण उस रिसर्च में छपा है, जिस रिसर्च को नोबेल पुरस्कार (अर्थशास्त्र) 2024 के लिए चुना गया है. जिन तीन लोगों को इकॉनमी साइंस के लिए नोबेल मिला है उनके नाम डारोन एसिमोग्लू, साइमन जॉनसन, और जेम्स ए. रॉबिन्सन हैं. इन तीनों ने काफी हद तक यह साफ कर दिया है कि क्यों कुछ देश अमीर हैं और कुछ देश गरीब क्यों रह गए हैं?
डारोन एसिमोग्लू, साइमन जॉनसन, और जेम्स ए. रॉबिन्सन के शोध ने यह बताया कि राजनीतिक और आर्थिक संस्थाएं किसी देश की समृद्धि को प्रभावित करती हैं. खासकर, यूरोपियन उपनिवेशवाद (European colonization) के दौरान बनाए गए संस्थागत ढांचे (institutional structures) अलग-अलग देशों की आर्थिक स्थिति में बड़ा अंतर पैदा करते हैं. इन तीनों नोबेल पुरस्कार विजेताओं का अध्ययन उन ऐतिहासिक कारणों से पर्दा उठाता है, जो वर्तमान में वैश्विक समृद्धि के अंतर को समझने में मदद करते हैं.
संस्थानों और समृद्धि के बीच संबंध
इस रिसर्च का प्रमुख बिंदु यह है कि विभिन्न देशों की समृद्धि में सबसे बड़ा अंतर उनके संस्थानों (इंस्टिट्यूशन्स) के कारण है. खासकर, यूरोपीय उपनिवेशवाद के दौरान बनाए गए संस्थागत ढांचे ने आज के समय में देशों के बीच आर्थिक असमानता को गहराई से प्रभावित किया है.
उपनिवेशवादियों ने जिन क्षेत्रों में घनी आबादी पाई, वहां उन्होंने स्थानीय संसाधनों का शोषण करने वाले ‘एक्स्ट्रैक्टिव’ (शोषणकारी) संस्थान स्थापित किए. इसका परिणाम यह हुआ कि इन क्षेत्रों में लंबे समय तक आर्थिक ठहराव बना रहा. इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में कम आबादी थी, वहां उपनिवेशवादियों ने समावेशी संस्थान बनाए, जिनका उद्देश्य था लॉन्ग टर्म आर्थिक वृद्धि. इसी के कारण, कई ऐसे क्षेत्र जो उपनिवेश के पहले समृद्ध थे, जैसे मैक्सिको, अब दुनिया के गरीब देशों में गिने जाते हैं, जबकि कम विकसित क्षेत्र जैसे अमेरिका आज समृद्ध देशों की सूची में हैं. इसे शोधकर्ताओं ने ‘रिवर्सल ऑफ फॉर्च्यून’ (समृद्धि का उलटफेर) कहा है.
उपनिवेशवाद और मृत्यु दर का प्रभाव
नोबेल विजेताओं ने यह भी जांच की कि उपनिवेशवाद के दौरान यूरोपीय निवासियों की मृत्यु दर ने संस्थागत विकास को कैसे प्रभावित किया. जिन क्षेत्रों में यूरोपीय उपनिवेशवादियों की मृत्यु दर अधिक थी, वहां उन्होंने शोषणकारी संस्थान स्थापित किए, ताकि शॉर्ट टर्म में ही लाभ लिया जा सके. वहीं, जिन क्षेत्रों में उपनिवेशवादी जीवित रह सकते थे, वहां लॉन्ग टर्म के नजरिए से आर्थिक समृद्धि को प्रोत्साहित करने वाले संस्थान बनाए गए.
शोषणकारी संस्थाओं का फंदा
तीनों अर्थशास्त्रियों ने एक सैद्धांतिक ढांचा भी विकसित किया है, जो यह समझाता है कि कैसे कुछ समाज ‘शोषणकारी संस्थानों’ के फंदे में फंस जाते हैं, जहां कुछ चुनिंदा लोग (एलीट्स) जनता के शोषण से लाभ प्राप्त करते हैं. इससे इन समाजों के लिए समावेशी संस्थानों में बदलाव करना कठिन हो जाता है. हालांकि, उन्होंने यह भी दिखाया कि बदलाव संभव है, खासकर तब जब जनता संगठित हो जाती है और सत्ता में बैठे लोगों के लिए खतरा पैदा कर देती है. इस तरह की परिस्थितियों में लोकतांत्रिक सुधार और आर्थिक परिवर्तन संभव होते हैं.
इन विजेताओं के शोध का आर्थिक और राजनीतिक विज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ा है. उन्होंने यह समझने में मदद की है कि कैसे ऐतिहासिक और संस्थागत कारक किसी देश की लॉन्ग टर्म इकॉनमिक डेवलपमेंट को आकार देते हैं. यह शोध इस बात को रेखांकित करता है कि समावेशी संस्थानों को बढ़ावा देना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का समर्थन करना आर्थिक विकास को स्थायी रूप से बढ़ावा देने के महत्वपूर्ण तरीके हैं.
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