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चुनाव में हर बार क्यों फेल हो जाता है एग्जिट पोल, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?EXIT POL

THN Network


NEW DELHI:
पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने टीवी चैनलों के एग्जिट पोल और उसके दावों पर पानी फेर दिया. छत्तीसगढ़ और राजस्थान को लेकर तो सभी एग्जिट पोल के दावे हवा-हवाई साबित हुए. पहली बार विधानसभा चुनाव में 10 से ज्यादा एजेंसियों ने चुनावी एग्जिट पोल तैयार किए थे. 

एग्जिट पोल विचार जानने की एक प्रक्रिया है, जो वोटिंग के तुरंत बाद मतदाताओं से वोटिंग पैटर्न के बारे में पूछा जाता है. सर्वे एजेंसी इसी को आधार बनाकर मतगणना से पहले जीत-हार का अनुमान लगाती है. 

हालांकि, इसके आंकड़े हमेशा सवालों में घिरे रहते है. एग्जिट पोल के नतीजे गलत होने की वजह से कई एजेंसियां सोशल मीडिया पर खूब ट्रोल भी होती है. 

वोटिंग पैटर्न और मुद्दे जानने के लिए शुरू की गई एग्जिट पोल अब सरकार बनाने और बिगाड़ने का आंकड़ा जारी करती है. हालांकि,  2004 के बाद से बहुत कम ही ऐसे मौके आए, जब एग्जिट पोल के नतीजे चुनाव परिणाम से मिलता-जुलता रहा हो.
 
पिछले 10 साल में एग्जिट पोल को तो सरकार के पक्ष में माहौल बनाने वाला एक टूल भी करार दिया गया है. यह अक्सर विपक्षी पार्टियों के निशाने पर रहता है. 

इस बार का एग्जिट पोल और चुनाव के नतीजे
2023 के 5 राज्यों के चुनाव को लेकर एक्सिस माई इंडिया, चाणक्या टुडे, मैट्रिज, सीएनएक्स, ईटीजी, पोलस्ट्रैट, जन की बात और सी- वोटर जैसी एजेंसियों ने एग्जिट पोल तैयार किए थे. दिलचस्प बात है कि किसी भी राज्य को लेकर सभी एजेंसियाों का परिणाम एक जैसा नहीं था.

छत्तीसगढ़ को लेकर सभी एग्जिट पोल एजेंसियों ने दावा किया कि यहां पर कांग्रेस की सरकार बनेगी, लेकिन चुनाव परिणाम ठीक इसके विपरीत आए. इसके अलावा कई राज्यों में एग्जिट पोल की रिपोर्ट में सीटों की संख्या को लेकर बहुत ही ज्यादा का अंतर था.

कुल मिलाकर कहा जाए तो हालिया चुनाव में एक भी एग्जिट पोल सच साबित नहीं हुए. अधिकांश एग्जिट पोल के आंकड़े सच्चाई से कोसों दूर थी. गलत साबित होने के बावजूद किसी भी एजेंसी की ओर से इसको लेकर कोई बयान जारी नहीं किया गया.

इसके उलट कई एजेंसियों ने वो आंकड़े जारी कर दिए, जो थोड़ा-बहुत चुनाव परिणाम से मिलता-जुलता था. 

भारत में चुनाव और एग्जिट पोल की कहानी
भारत में पहली बार एग्जिट पोल का प्रकाशन साल 1980 में किया गया था. यह पूरी तरह से प्रिंट माध्यम पर प्रकाशित किया गया था. इस एग्जिट पोल में मुद्दों के बारे में तस्दीक से बताया गया था. इस पोल में जाति, धर्म और आपातकाल को लेकर सवाल पूछे गए थे. 

मार्ग-इंडिया टुडे के इस पोल में अधिकांश लोगों ने इंदिरा गांधी सरकार के फिर से आने की बात कही थी. 90 प्रतिशत लोगों ने कहा था आपातकाल से उनका कोई प्रभावित नहीं हुआ. इसके बाद 1984 और 1989 में भी एग्जिट पोल किए गए.

1996 में पहली बार दूरदर्शन टीवी ने सीएसडीएस एजेंसी के साथ मिलकर श्रव्य-दृश्य माध्यम में एग्जिट पोल तैयार किया. सीएसडीएस के इस पोल देशभर में 9614 लोगों से राय ली गई थी.

सर्वे में शामिल 28.5 प्रतिशत लोगों ने कांग्रेस और 20.1 प्रतिशत लोगों ने बीजेपी को वोट देने की बात कही थी. करीब 40 प्रतिशत लोगों ने अन्य पार्टियों को वोट देने की बात कही थी. यह एग्जिट पोल पूरी तरह सच साबित हुआ था. 

निजी टीवी चैनलों के आने के बाद एग्जिट पोल का दबदबा बढ़ता गया. वर्तमान में 10 से ज्याद एजेंसियों द्वारा एग्जिट पोल तैयार किया जाता है.

टीवी चैनलों का एग्जिट पोल क्यों हो जाता है गलत?
बड़ा सवाल यही है कि आखिर टीवी चैनलों का एग्जिट पोल अक्सर क्यों गलत हो जाता है? या दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां जनता की नब्ज ठीक ढंग से क्यों नहीं टटोल पाती है?

अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता सैम सोलोमोन के मुताबिक एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों के पास वक्त बहुत ही कम रहता है. मतदान के तुरंत रिपोर्ट प्रकाशित करने की जल्दबादी और गलत डेटा इकट्ठा करने की वजह से एग्जिट पोल फेल हो जाता है.

सोलोमोन के मुताबिक एग्जिट पोल करने वालों की एक बड़ी परेशानी मतदाताओं से बात करने की होती है. वोट देने के बाद अधिकांश मतदाता पोलिंग बूथ के बाहर किसी एजेंसी से बात नहीं करना चाहते हैं. अगर कोई बात करते भी हैं, तो उनपर बाहरी प्रभाव रहता है.

तेलंगाना चुनाव में एग्जिट पोल तैयार करने वाले केस स्टडी के विकास कुमार कहते हैं- 2004 के बाद एग्जिट पोल का तरीका है, उसकी वजह से यह लगातार विवादों में रहता है. इसके गलत होने की 3 मुख्य वजह है-

1. एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां मतदाताओं की डेमोग्राफी जैसे कि विविधता, सामाजिक-सांस्कृतिक और अस्थिरता पर ध्यान नहीं देती है. इसकी वजह से अक्सर एग्जिट पोल गलत साबित होते हैं.

2. एग्जिट पोल तैयार करने की जल्दबाजी में एजेंसियां उन बूथों पर नहीं पहुंच पाती है, जहां किसी विशेष पार्टी का वर्चस्व न हो. या दूसरे शब्दों में कहे तो किसी विशेष पार्टी के मतदाता न हो. 
 
3. आजकल अधिकांश एजेंसियां वाररूम एग्जिट पोल तैयार करने लगी है. यानी किसी दफ्तर में बैठकर ही गुणा-गणित के जरिए रिपोर्ट तैयार कर लेती है. गुणा-गणित से तैयार रिपोर्ट को क्रॉस चेक करने के लिए कुछ स्थानीय लोगों से बात कर लेते हैं और फिर उसे प्रकाशित कर देते हैं.

ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय के मुताबिक किसी भी एग्जिट पोल में सीट की संख्या बता पाना सबसे मुश्किल काम है. भारत में मतदाताओं का जो व्यवहार है, उसमें यह काम और भी कठिन हो जाता है. 

वार्ष्णेय आगे कहते हैं- भारत में एग्जिट पोल बनाने वाली एजेंसियां यह काम कैसे करती है, यह भी समझ से परे है.

एग्जिट पोल पर बैन लगाने की जरूरत है?
भारत में चुनाव बाद आए पोल का असर शेयर बाजार पर भी होता है. 2018 में पांच राज्यों के एग्जिट पोल के बाद शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली थी. उस वक्त एग्जिट पोल की वजह से मुंबई शेयर बाजार का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स करीब 2 प्रतिशत तक टूट गया था. 

दिल्ली चुनाव 2015 के एग्जिट पोल आने की वजह से भी शेयर मार्केट में हलचल हुई थी. एग्जिट पोल कई बार विपक्षी नेताओं के भी निशाने पर रहते हैं. विपक्षी नेताओं का कहना है कि एग्जिट पोल के जरिए केंद्रीय सत्ताधारी पार्टी लोगों को भ्रम में रखना चाहती है, जिससे रिजल्ट के वक्त बेमानी की जा सके.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एग्जिट पोल पर बैन लगाने की जरूरत है?

विकास कुमार कहते हैं- बैन लगा देना इसका विकल्प नहीं है. इसमें सुधार की दिशा में काम करने की जरूरत है. बड़े एजेंसियों को सैंपल कलेक्शन पर ज्यादा फोकस करना चाहिए. सीट प्रेडिक्शन से भी बचने की जरूरत है. 

वे आगे कहते हैं- दर्शकों को भी जागरूक होना चाहिए. जापान में किसी भी पोल में सीट प्रेडिक्शन का काम नहीं किया जाता है. इसकी वजह वहां कोर्ट द्वारा लगाया जाने वाला भारी जुर्माना है. 

दरअसल, जापान में एग्जिट पोल के गलत होने पर अगर कोई एजेंसी के ऊपर मुकदमा दाखिल करता है, तो कोर्ट से संबंधित एजेंसी पर भारी जुर्माना लगाया जाता है. इसी को देखते हुए वहां की एजेंसियों ने वोट प्रतिशत और मुद्दे पर ही एग्जिट पोल जारी करना शुरू किया.


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